जब हुए हम तब था क्या , और अब क्या आज है !
थी खुशी घर में सभी को , खो गई जो आज है !
था सवेरा तब ज़िन्दगी में , जो अँधेरा अब आज है !
देखा था जो रास्ता तब , खोया सा अब वो आज है !
सूर्य सा था तेज़ जो तब , अब वो बनके तैय्यार आग है !
देखा था जो सपना तब , अलापता अभी भी वही राग है !
ज़िन्दगी करीब से देखी न थी तब , देखता जो वो आज है !
सोंचता था कुछ न वो तब , सोंचता वो जो अब आज है !
आज जागी है तमन्ना , कुछ कर गुज़र जाने की मन में उसके !
देखेगा सारा ज़माना पूरी होगी हसरत थी जो दिल में उसके !
रोकने से रुकेगा न वो , रोकने की कोशिश न करना !
आँधियों को चीरता वो , बनाएगा खोया रास्ता अपना !
अब है दिखती मंजिल वो उसको , देखता था वो जो तब !
खुशी आएगी मेहनत से उसके , जो खुशी थी घर में तब !
थी खुशी जो घर में तब , आज अब आने को वो बेकरार है !
मेहनत से न डर ओ आदमी , तू भी खुशी का हकदार है !
जो था अंधेरा ज़िन्दगी में तब , बन के सवेरा वो अब आज है !
रात में बन के सितारा , चमकता आसमान में अब वो आज है !
जब हुए हम तब की खुशी , अब फैलाती रोशनी जीवन में आज है !
माता पिता की सब कुर्बानी , लाई रंग जीवन में उनके आज है !
Saturday, October 25, 2008
" सीख जीना ज़िन्दगी कुछ इस तरह "
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी कुछ इस तरह ,
कि उदासी न आए ज़िन्दगी में किसी तरह !
आसान नही इतना, ये मुश्किल भी नहीं है,
कुछ हार कर भी जीतना, आसान नहीं है !
कर अभिवादन वृद्धों का कुछ इस तरह,
कि मिल जाएँ उनकी कुछ दुआएँ किसी तरह!
इन दुआओं का असर, तू जानता नहीं है,
इंसान होकर भी इंसानियत को पहचानता नहीं है!
कर तू सामना ज़िन्दगी का हर तरह,
कि न टेक घुटने ज़िन्दगी के सामने किसी तरह !
उम्मीद से कायम है दुनिया , तू जानता नहीं है,
किस मोड़ पर मिल जाएँ ईश्वर तू पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी कुछ इस तरह,
कि भ्रम न आए मन में तेरे किसी तरह!
जो ताकतें हैं तेरे पास, उसको तू जानता नहीं है,
क्योंकि अपनी अंतर्रात्मा को तू पहचानता नहीं है!
जिस दिन पहचान लेगा अपनी अंतर्रात्मा कि शक्तिओं को किसी तरह,
तब करेगा बुद्धि और विवेक से काम हर तरह !
काम ऐसा कर जाएगा तू जानता नहीं है,
किस किस के दिल पे छा जाएगा , तू पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह ,
न हो प्यारा दूसरा तुझसा दुनिया में किसी तरह !
छू लेगा तू आसमान को जानता नहीं है,
मंजिल कितने पास है तेरे , पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह ,
कि कर दे दर किनार कठनाइयों कि दीवार को हर तरह !
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह......!
कि उदासी न आए ज़िन्दगी में किसी तरह !
आसान नही इतना, ये मुश्किल भी नहीं है,
कुछ हार कर भी जीतना, आसान नहीं है !
कर अभिवादन वृद्धों का कुछ इस तरह,
कि मिल जाएँ उनकी कुछ दुआएँ किसी तरह!
इन दुआओं का असर, तू जानता नहीं है,
इंसान होकर भी इंसानियत को पहचानता नहीं है!
कर तू सामना ज़िन्दगी का हर तरह,
कि न टेक घुटने ज़िन्दगी के सामने किसी तरह !
उम्मीद से कायम है दुनिया , तू जानता नहीं है,
किस मोड़ पर मिल जाएँ ईश्वर तू पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी कुछ इस तरह,
कि भ्रम न आए मन में तेरे किसी तरह!
जो ताकतें हैं तेरे पास, उसको तू जानता नहीं है,
क्योंकि अपनी अंतर्रात्मा को तू पहचानता नहीं है!
जिस दिन पहचान लेगा अपनी अंतर्रात्मा कि शक्तिओं को किसी तरह,
तब करेगा बुद्धि और विवेक से काम हर तरह !
काम ऐसा कर जाएगा तू जानता नहीं है,
किस किस के दिल पे छा जाएगा , तू पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह ,
न हो प्यारा दूसरा तुझसा दुनिया में किसी तरह !
छू लेगा तू आसमान को जानता नहीं है,
मंजिल कितने पास है तेरे , पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह ,
कि कर दे दर किनार कठनाइयों कि दीवार को हर तरह !
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह......!
Friday, October 24, 2008
" मेरी किस्मत "
मेरी किस्मत भी है कैसी ,
की रास्ते भी खुलते नही !
जिधर देखूँ , कहीं देखूँ ,
बस दीवार ही दीवार है !
मेरी किस्मत, मेरी किस्मत !
मेरी किस्मत भी है कैसी ,
की ऊजाला भी दिखता नही !
वहाँ देखूँ , कहाँ देखूँ ,
बस अँधेरा ही अँधेरा है !
इन अंधेरों ने ऐसा है घेरा ,
की धर्म पुरूष भी दिखता नही !
मेरी किस्मत, मेरी किस्मत !
मेरी किस्मत भी है कैसी ,
जो तलाशता है आज इंसान को !
हैवानिअत की हद पार कर ,
अब इंसान भी हैवान है यहाँ !
मेरी किस्मत को अब रास्ता दिखता नही !
मेरी किस्मत, मेरी किस्मत !
मेरी किस्मत भी है कैसी ,
की राह भी दिखती है मुश्किल !
अब देखूँ , जब देखूँ ,
बस इंतजार ही इंतजार है !
मेरी किस्मत , मेरी किस्मत !
की रास्ते भी खुलते नही !
जिधर देखूँ , कहीं देखूँ ,
बस दीवार ही दीवार है !
मेरी किस्मत, मेरी किस्मत !
मेरी किस्मत भी है कैसी ,
की ऊजाला भी दिखता नही !
वहाँ देखूँ , कहाँ देखूँ ,
बस अँधेरा ही अँधेरा है !
इन अंधेरों ने ऐसा है घेरा ,
की धर्म पुरूष भी दिखता नही !
मेरी किस्मत, मेरी किस्मत !
मेरी किस्मत भी है कैसी ,
जो तलाशता है आज इंसान को !
हैवानिअत की हद पार कर ,
अब इंसान भी हैवान है यहाँ !
मेरी किस्मत को अब रास्ता दिखता नही !
मेरी किस्मत, मेरी किस्मत !
मेरी किस्मत भी है कैसी ,
की राह भी दिखती है मुश्किल !
अब देखूँ , जब देखूँ ,
बस इंतजार ही इंतजार है !
मेरी किस्मत , मेरी किस्मत !
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