हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी कुछ इस तरह ,
कि उदासी न आए ज़िन्दगी में किसी तरह !
आसान नही इतना, ये मुश्किल भी नहीं है,
कुछ हार कर भी जीतना, आसान नहीं है !
कर अभिवादन वृद्धों का कुछ इस तरह,
कि मिल जाएँ उनकी कुछ दुआएँ किसी तरह!
इन दुआओं का असर, तू जानता नहीं है,
इंसान होकर भी इंसानियत को पहचानता नहीं है!
कर तू सामना ज़िन्दगी का हर तरह,
कि न टेक घुटने ज़िन्दगी के सामने किसी तरह !
उम्मीद से कायम है दुनिया , तू जानता नहीं है,
किस मोड़ पर मिल जाएँ ईश्वर तू पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी कुछ इस तरह,
कि भ्रम न आए मन में तेरे किसी तरह!
जो ताकतें हैं तेरे पास, उसको तू जानता नहीं है,
क्योंकि अपनी अंतर्रात्मा को तू पहचानता नहीं है!
जिस दिन पहचान लेगा अपनी अंतर्रात्मा कि शक्तिओं को किसी तरह,
तब करेगा बुद्धि और विवेक से काम हर तरह !
काम ऐसा कर जाएगा तू जानता नहीं है,
किस किस के दिल पे छा जाएगा , तू पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह ,
न हो प्यारा दूसरा तुझसा दुनिया में किसी तरह !
छू लेगा तू आसमान को जानता नहीं है,
मंजिल कितने पास है तेरे , पहचानता नहीं है!
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह ,
कि कर दे दर किनार कठनाइयों कि दीवार को हर तरह !
हे प्राणी तू सीख जीना ज़िन्दगी को इस तरह......!
Saturday, October 25, 2008
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3 comments:
acchi hai par spelling mistaks hai.............
Simply superb!
Really awesome combination of your feelings and expression!Kudos!Keep going, keep hunting!Your poem reflects your ideologies,which u have adopted in your life..Wonderful!
acchi h yarrr..vry nice..pr tere dimag mn itne sare bate kaise aati h
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